Thursday, 24 May 2012

तुम्हारी मौत

दीवारों का रंग स्याह क्यों हुआ?
कल तक तो सुखों के रंग दमकते थे,
दुख चील की तरह पंख फैलाए है।
उन पंखों की छाया से दीवार स्याह हुई,
कल तक मेरे सपने सूखे थे,
जो सुख से लबरेज थे, और तुम्हारे,
अहसासों से भरे थे॥
आज सपने गीले-गीले हैं,
दुख की पैंठ सपनों तक पहुँच
चुकी है,
बे-मौसम की बारिश
मेरे आसुओं को धोने मे प्रयासरत है।
मैं गंगा के तट मे,
तुम्हारी अस्थियों का विसर्जन
देख रही हूँ, यकायक पानी मे
तैरती अस्थियों मे मुझे मेरा ही
चेहरा नजर आता है,और तट मे बैठे तुम
लगता है की तुम नहीं मरे, किसी ने
तुम्हारी मौत की झूठी खबर मुझ तक फैलाई
ये विसर्जन भी झूठा है। तुम तो आज भी
जीवित हो। मुझमे सांस लेते हुए,
हो सके तो स्याह पुती दीवारों पर
प्रेम का रंग चढ़ा देना,
और गीले सपनों मे सुख का
सूखापन मिला देना........

7 comments:

  1. जो भीतर में हो उसका विसर्जन क्या ...

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  2. कल 25/05/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  3. भावपूर्ण सुन्दर अभिव्यक्ति.....

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  4. सर्जन का विसर्जन नहीं होता
    बहुत सुन्दर रचना

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  5. geele-geele sapne aur geele sapnon me sukh ka sukhapan.. ekdam anoothi kalpna hai... bahut sundar lagi apki yah rachna...

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  6. बेहतरीन भाव लिए ..उत्‍कृष्‍ट लेखन

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  7. बहुत साधारण बातों को कहने का असाधारण ढंग |

    सादर

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