Tuesday, 22 May 2012

हृदय का पुस्तकालय

 
तेरी यादों की पुस्तक,
हृदय के पुस्तकालय मे लगी है,
जिसमे हमारे मिलन की
अद्भुत कथा गड़ी है,
मैं उस पुस्तक को पुनः
नहीं खोलना चाहती,
... किन्तु शत्रु समीर के समक्ष
मुखरहीन हो जाती
वो अपने वेग से
इक-इक प्रष्ठों को खोल
मुझे कष्ट पहुंचा रहा है,
और तुम्हारी जुदाई का दुख
नमक रूप मे नैनो से बहता जा रहा है
और पीड़ित मन की आतुरता स्वयं कह उठी,
दर्द की अभिव्यक्ति जब भी मेरी
आँखों से बहेगी,
तेरे पाषाण हृदय मे भी ठोकर लगेगी।
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मैं दूषक हूँ नहीं तेरी
ना बनना चाहती हूँ,
ना फिर से अब तेरे मन
को मैं पढ़ना चाहती हूँ। सोनिया बहुखंडी गौर

5 comments:

  1. बहुत ही खुबसूरत और प्यारी रचना..... भावो का सुन्दर समायोजन......

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  2. वाह ...बहुत खूब।

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  3. बहुत खुबसूरत प्यारी सी रचना....

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  4. भाव बहुत पसंद आये |

    सादर

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