Monday, 14 May 2012

तुम हो नहीं सकते मेरे





जब हम मिले थे

मौनता का एक

शीर्षक था समीप

फिर मौन तेरा,

आज क्यों ?

हो गया इतना आधीर,

थे पृथक अपने रास्ते

होने लगे हैं

क्यों करीब?

है स्नेह तेरा निषकलुष

इसमे कोई शंका नहीं
फिर राग की तृष्णा
तेरी हुई क्यों अतीव,

जब हम मिले थे----------

क्यों हृदय सागर

बन गया?

क्यों प्रीति की

वीरुध बड़ी

लगने लगा है क्यों

मुझे परिकल्पना हो

तुम मेरी?

क्यों भीति मन

मे है छुपी

जब ज्ञात है

मुझको सभी,

तुम हो नहीं सकते मेरे

इस ज़िंदगी मे कभी
जब हम मिले थे-----------------

12 comments:

  1. हर शब्‍द बहुत कुछ कहता हुआ, बेहतरीन अभिव्‍यक्ति के लिये बधाई के साथ शुभकामनायें ।

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  2. सीधे दिल से निकले भाव,.....
    बहुत अच्छी अभिव्यक्ति.

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  3. उम्दा अभिव्यक्ति।

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  4. bhaut hi khubsurat abhivaykti....

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  5. क्या बात है...बहुत ही बढ़िया दीदी!

    सादर

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  6. आप सभी का आभार एक पंक्ति छूट गई थी मैंने उसे ठीक कर दिया । इस बात के लिए मुझे खेद है।

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  7. बहुत ही सुन्दर कोमल भाव व्यक्त करती रचना ....

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  8. milkar na mil paane ki vyatha ko bahut khoobsurati ke sath vyakt kiya hai aapne .....

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  9. अनुपम भाव संयो‍जित किये हैं आपने इस अभिव्‍यक्ति में ... ।

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  10. प्रभावी द्वंदाभिव्यक्ति...
    सादर बधाई।

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  11. प्रभावी रचना |

    सादर

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