Thursday, 19 April 2018

निर्वासन के बाद

मेरा बेटा अक्सर पिता को पुकारता है
मैं उसे हंसिये जैसा धारधार चाँद दिखाती हूँ

चाँद की परछाई मुझ पर पड़ती है
दर्द के नीले निशान उभर आते हैं

चाँद एक पुरुष है
जो कर्कश आवाज में बोलता है
निकलो आसमानी घर से

हंसिये की खरोच से
घायल हैं मेरी हथेलियाँ
मेरा बेटा  चाँद नहीं देखता

धरती में टंके सितारे देखता है
जो मैंने काढ़े हैं
अब वो माँ पुकारता है

Wednesday, 14 March 2018

आज़ाद चिट्ठियां

आज़ाद चिट्ठियां
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उदासियों के बीच कई बच्चियों ने लिया होगा जन्म
इन बच्चियों के कहीं नहीं थे घर
इनकी माँएं पिता के बनाये घरों में रहती थीं
उनका भी कोई घर नहीं था!
ये सभी शील सुबहं थीं
जो क़ैद थीं गुड़ियाघर में
जो बाँट जोह रहीं थी उस पहली औरत का
जो जला देगी उत्तराधिकार के नियमों की गलत  संहिता

कुछ बच्चियां धड़कती रातों को पैदा हुई
इन सभी के पास घर थे खुद के
ये पिता द्वारा बनाई गईं थीं
ये पिता की गर्जनाओं को गीली शिलाओं पर लिख रही थीं
अन्धकार में बैठी ये सभी भविष्य की
उत्तराधिकारिणी होंगी, पितृसत्ता की
उनमें से कुछ
माँ कहलाएंगी
कुछ सास
इनका होना ही  निर्दोष कैदियों की जमात बढ़ाता रहना है।

कुछ बच्चियां जेल में पैदा हुईं ईश्वर की निगरानी में
ये बचपन से पढ़ रहीं थी बच निकलने के पाठ
अपनी माँओं से छुप के
सड़े गले नियमों को चलाने वाली संहिता
को जला देने वाली आग को  जलाना सीख रहीं थीं.....
सीखा इन सभी ने मुलाकातें तय करना
तमाम कैदियों के बीच
नए किस्म के घर बनाना सीखना उनकी कलाकारी थी
जहाँ शील सुबह उगी लताओं की तरह

उन्होंने तरक्की के रास्ते बनाये
उनके लिए
जो निजात दिलाएं तमाम कैदियों को
ईश्वर की निगरानी में पैदा हुई ये सभी
बच्चियाँ आज़ाद चिट्ठियां हैं जो पढ़ी जा रहीं है

इनमें ही है कोई एक वह पहली औरत
जो जला देंगी गलत नियमों की किताब।

Soniya Pradeep Gaur
Soniya Bahukhandi

Thursday, 8 March 2018

तलाकशुदा औरतें

फसल नई औरतों की
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मैंने नहीं रखा कभी सोमवार का व्रत
रूठे शिव को मनाने के लिए....
के उनके जैसा ही कोई रूठा मिले
जिसे मनाते मनाते जीवन उपवास हो जाए

कसम से मैंने कभी नहीं बताया माँ को
मुझे पसंद है दिलकश आवाज और
खिचड़ी बालों वाले
या पहाड़ों की धूप में तचे रंग में कोई एक ख़ास

कभी नहीं बांधे मैंने उस पुराने वट में
मन्नत के धागे
नहीं जलाई तुलसी के सामने धूप-बत्ती
बचपन  से सुनती रही उसकी बेचारगी की कहानी

मैंने कभी नहीं माँगा प्यार, पके आम की तरह वह मुझे अपनेआप मिला
शादी एक विकल्प की तरह थी मैंने स्वीकार किया
क्योंकि मुझे  आम कुछ खास पसंद नहीं थे
विकल्प भविष्य में मेरी आत्मा में होने वाला एक घाव है

मुझे पसंद था मेरा बचपना
जिसकी पीली फ्रॉक पर सुर्ख लाल तितलियां उड़ती थी
अब तितलियां यादों के पुराने फ्रेम में क़ैदियों की तरह छटपटाती हैं
विकल्प शादी की अल्बम में खिंचे मंडप में मन्त्र की तरह गूंजता रहता है

जाने वो कौन पहली औरत थी जिसने विकल्प स्वीकारने की नींव धरी
अब पूरी बस्ती तैयार है घायल औरतों की
उस पहली रहस्यमी औरत की खोज में रखने लगी हूँ इन दिनों मैं भी शिव का व्रत!

वो पहली औरत दफन है उसी जमीं के भीतर एक सभ्यता बनकर
जिसमे फ़ैल चुकी है उपवास करती कराहती हुई स्त्रियां
उत्खनन में उसका जीवाश्म नहीं मिलेगा
मिलेंगे सोने के सिक्के
जो पैदा करेंगे झपट्टा मारने वाले विकल्प

मैं कराहती औरतों के बीच लौटूंगी, अपना व्रत खंडित करने
मुझे भी बनना है अब पहली औरत.... जो अपने विकल्प को त्याग देगी
भले फ़ैल जाए सनसनी समाज के बियाबान जंगल में
मेरी माँ मुझे लुभाती रहे  खिचड़ी बालों वाले की रूपकथा सुनाकर।

मेरे इस नए जन्म के बाद ही फैलेगी नई बस्तियां समाज में
सुनाई जाएँगी नई औरतों की सभ्यता की कहानी
अब मैं भी आम पसन्द करने लगी हूँ।

Soniya Bahukhandi
#औरतें
Happy international womens day

Wednesday, 7 March 2018

माँ ने गलत सिखाया है/ महिला दिवस पर विशेष

माँ ने गलत सिखाया है
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अगर मेरी कविता पढ़ते वक़्त
नज़र आये मेरा दुःख
उसे बहने देना दिल में
ये दर्द मेरी जैसी असभ्य औरतों का दुःख होगा।
जो आज तक न समझ पाई पुरुष स्त्री का भेद!

तुम सिखा सकती थी इस भेद को कुछ यूँ, जैसे
फसल अपने भीतर छुपाये रहती है  अनाज
अपनी देह को तपाते हुए पैदा करती है गेँहू-धान
ऐसी ही  होती है औरत जो दर्द में होकर भी पैदा करती हैं पुरुष!

पर तुम बोली धीरे बोलो भइया तो लड़का है
तुम ठहरी लड़की
समाज की जुबान फुसफुसी है लेकिन कान तेज हैं
शांत रहो

पहली दफ़ा जब पेट दर्द और शरीर में महसूस किया था चट्टानों के भार को
तुम मुझे समझा सकती थी की औरत भी ब्रह्मा है पर
तुम मुझे अचार में फैली फफूँद और पूजाघर की सरहदों के बारें में समझाती रही।

और समाज फुसफुसाता रहा
एक और अछूत के बढ़ जाने पर

मुझे तुम रात और दिन का भेद समझा सकती थी
जब उम्र मुझमें घोड़े की तरह सवार थी
तुमने लगा दीं मेरे खेलने पर पाबंदी
मुझे मुझसे लड़ने के लिए छोड़ दिया अकेला

मैं देखती रही बिखरते हुए कई लड़कियों को सड़कों पर रात में
जो मासूम सुबह तक बेशर्म अख़बार की सुर्खियां बन गई

माँ तुम्हारा समाज चोर है जो फुसफुसा के भाग जाता है
मैं सिपाही की तरह उसे खोज रही हूँ
और तुम आज तक उसकी भयानक तस्वीर दिखा के
मुझे डरा रही हो।

मैं महसूस कर रही हूँ तुममें दर्द नही पैदा हुआ
मुझ जैसी असभ्य औरत को समझने का

Soniya Bahukhandi

Saturday, 11 November 2017

निर्वासन के बाद देहकोठरी

निर्वासन के बाद देह कोठरी
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माँ बोली ठीक नही तुम्हारे लिए
बिल्कुल नागफनी है वह
स्वाद भी मीठा नही
रंग शक्कर जैसा है बस उसका

उसने सुना और
अपनी आकाश जैसी बाहें फैला दी
पहाड़ तिलचट्टों  जैसे शोर मचाते रहे
रातें नदियों में डूबती गईं, चाँद शर्माता रहा

रात के विदा होते ही सिमटने लगी उसकी लंबी लंबी बाहें
बिखरे पड़े थे नागफनी के दंश,
पहाड़ों पर रेंगती लाल चीटियां
झूठे आनंद की मौत अपनी ही परछाइयों में
खामोशी से देखती रही ये हादसे मेरी माँ
जिसने कहा था ठीक नही वह तुम्हारे लिए
Soniya Bahukhandi

निर्वासन के बाद देहकोठरी

निर्वासन के बाद देह की कोठरी
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उसने चुना प्यार
भूख नही लगती अब उसे
पेट फूलों की पंखुड़ियों से छोटा होता है

धूप उस पर गुजरती है
वह फूल सी कुम्हला जाती है
कुम्हलाते फूलों का झड़ना पतझड़ के जीवन की परिभाषा है

पतझड़ का जीवित होते ही
बोलना
भूख बढ़ाना सीखो
बढ़ती भूख वसन्त का पुनर्जीवन होगी

अब उग रहे हैं उसकी नाभि में
सुर्ख फूल

शेष
Soniya Bahukhandi

Thursday, 28 September 2017

बेशर्म पत्नियां

रात की तन्हाइयों से भी डरावना था
भरोसा टूटना।

नाली के कीचड़ से ज्यादा घिनौना
अपमान की बारिश के छींटे पड़ना था

प्रेम से  थोड़ा ज्यादा बेशर्म थी
नदी सी देह!

पृथ्वी से भारी  उसकी दो आंखें
दो बहरूपिया संसार थे जिसमें।

घिनौने संसार को पार करके
देखने भर को ही मिल पाता था बेशर्म प्रेम का संसार!

नदी वास्तव में ज्यादा बेशर्म है
या फिर पत्नियां!