Friday, 21 September 2012

सुबह के अख़बार से डर लगता है

सुबह के अख़बार से डर लगता है,
आदम से आदम की दुश्मनी,जमाने मे कहर लगता है।

ना जाने किस खबर से दिल दहल जाये,
ये सोचकर भी डर लगता है।

आस-पास फैली है बारूदों की बू कैसी,
अब तो सारा शहर आतंकियों का घर लगता है।

ईमान बिकता है बाज़ारों मे अब,
नेताओं के घर,भ्रष्टाचारी का शजर लगता है।

एक झूठा संविधान थामे बैठे हैं,
जो लोकतन्त्र से बेखबर लगता है।

अपनी ही नगरी मे राम चोर बन गए,
कुछ नहीं ये तो कलयुग का असर लगता है।

सोनिया प्रदीप गौड़

(कार्टून: 'असीम त्रिवेदी')

8 comments:

  1. बेहतरीन............

    अनु

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  2. bahut sundar aur stik soniya.....ab to ishwar bhi dara sa hai, yahan aane main, apni rachna se unhe bhi dar lagta hai...........soniya...

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  3. मुझे बहुत सवेरे,रात गए फोन की घंटी से डर लगता है...

    संविधान तो कब्र है अधिकार,कानूनों का
    सच तो उसके नीचे बोलने का अधिकार माँग रहा

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  4. Bahoooooooot Pyari Kavita,Bahooot kam shabod mei Bahooot kuch likha aapne Soniya Bahukhandi Gaur jee,Lajwaaaab likha aapne,
    RAM RAM, SHUBH PRABHAAT

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  5. बहुत सटीक अभिव्यक्ति...

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