Thursday, 20 September 2012

माँ-तूने-कहा-,गाँव-मे -सूखा -पड़- गया!!

माँ-तूने-कहा-,गाँव-मे -सूखा -पड़- गया,
फिर-कैसे-तेरे-आंखो-में सावन-का-असर-पड़-गया।

शहर-की-आबो-हवा -मुझको-भी कहाँ-भाती-है।
क्या-करूँ-मजबूरीयों-से मेरा-वास्ता-पड़-गया।

बचपन -होता -,तो-स्कूल-के-बस्ते-मे-छिपा-देती-मजबूरी-को,
क्या-करूँ-मेरे-बचपन-को-वक़्त-का-चांटा-पड़-गया....

सोनिया प्रदीप

6 comments:

  1. बचपन -होता -,तो-स्कूल-के-बस्ते-मे-छिपा-देती-मजबूरी-को,
    क्या-करूँ-मेरे-बचपन-को-वक़्त-का-चांटा-पड़-गया....

    वाह क्या बात है, सुन्दर पंक्तियाँ

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  2. बचपन होता तो छुपा देई बक्से में मजबूरियों को,टिफिन बॉक्स से निकालती अन्नपूर्णा ...माँ, ऐसा जादू क्यूँ नहीं होता

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  3. सच्चाई को बड़ी सहजता से कह डाला......

    सुन्दर भाव...
    अनु

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  4. बढ़िया प्रस्तुति बहुत बधाई

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  5. बडी़ ही सरलता और सहजता से मन के भाव कह दिया...

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