एक औरत जो सनातन है, रोज गुज़र रही है कार्बन डेटिंग से, वह औरत ख्याल नहीं सोचती बस बातें करती है चीकट दीवारों से बेबस झड़ती पपड़ियों के बीच लटके बरसों पुराने कैलेंडर में अंतहीन उड़ान भरते पक्षियों से! और हाँ, बेमकसद बने मकड़ियों के जालों से भी। उसी औरत की डायरी के पन्ने खंगाल के लाइ है मेरी कलम जो आप सबको नजर है।
Wednesday, 11 September 2024
संवाद
Monday, 23 December 2019
परमेश्वर
Saturday, 16 February 2019
पुलवामा
#पुलवामा
कल से रसोई में छौंक नहीं पड़ी
उबला खाना.... जेहन में विचारों की तरह उबल रहा है
माँ कहती है मरने वाले के लिए दो बेल खाना छोड़ना पड़ता है।
कल से बेटे ने खिलौना बंदूक उठा रखी है
पूछता है किसने बनाई ये पिस्तौल
मैंने कहाँ हमने
गोलियां किसने डाली
मन ही मन बुदबुदाई "हमने"
बेटा बोला कल से पापा शांत हैं
मेरे सर को एक बार नहीं सहलाया
मैंने कहा- कई पिताओं का शोक उनके सर पर बैठा है।
भाई कहता है मुझे लाल रंग बेहद पसंद है
पर इतना भी नहीं कि
तिरंगा रंग जाए, मेरी पसंद को जीवन का अंश बनना चाहिए
मौत का नहीं!
पड़ोस की सुखिया दादी बोली
बाबू बोला था
मरूँगा नहीं मैं माई याद रखना
बस जाते समय खुद को तुम में छोड़ जाऊंगा
खामोशियाँ मत पकाना मेरे शोक में
घर के लोगों के बीच नर्म मुस्कान बो देना
जो शहीदों की मौत पर
ईश्वर की बैठक तक गूँजे।
और मैं दो बेल का खाना
छोड़े शोक मना रही हूँ
जबकि मुझे भी ईश्वर की बैठक को
सुखिया दादी की नर्म मुस्कान से विचलित करना है
मुस्काते हुए!
सोनिया गौड़
Wednesday, 30 January 2019
हंकार
सोलह कमरे हर्पणा भरी रातें
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अजीब डरावनी रातें होती हैं इन पहाड़ों में, मंगलेश डबराल की लालटेन दिखी नहीं मुझे किसी भी पहाड़ में, अब तक जितने भी देखे मैंने शायद सभी लालटेन्स कब की फूट चुकी थी। इन भयानक अंधेरों में बाघ से डर नहीं लगता था जितना झींगुरों की आवाज से लगता था। घरभूत के जागर मानो हमेशा किसी कोठरी में बजते थे.... छल, छाया और हर्पणा, रात में बंद दरवाजों के बाहर खड़े रहते हैं कि कब आधी रात को द्वार खुले और किसी का शरीर बिना किराये के रहने को मिले। अक्सर इन आधी रातों में नींद खुल जाती थी मेरी, सातवाँ कमरा मेरा, सोलह करों में से । ग्यारह स्टूडेंट में दस कमरे स्टूडेंट को मिले थे। नौ लड़के और दो लड़कियाँ.....
कुछ लड़के कुमाऊँ के थे कुछ गढ़वाल के और मैं थी उत्तराखंड की।
कहाँ तो मैं रातों में डरती रहती की कभी किसी हर्पणा का शिकार ना हो जाऊं।
वहीँ दूर दिल्ली में इसी समय राहुल और सोनिया गांधी पर विकीलीक्स के खुलासे ने अमेरिका की पोल खोल के रख दी थी। वर्ल्ड कप में इंडिया जीत के लगभग करीब ... और इन्हीं डरावनी रातों में एक भारत की जीत की रात थी जब सारे छल छाया और हर्पणा डर से दुबक गई थी, सीटियों और पटाखों की आवाज़ें सुनकर।
तिवारी मेरे पास आया और बोला, कीर्ति मैडम प्लीज ताऊ जी से बोतल मांगो न।
मैं उन्हें हैरानी से देखते हुए बोली तिवारी सर पर मैं क्यों, अजीब नहीं लगेगा कि मैं दारू की बोतल मांगू आप लोगों के लिए, बुड्डा वैसे ही लालची है ज्यादा पैसे मांगेगा।
तिवारी जी: आप एक बार कहो तो
मैं: ओके जाती हूँ। मैं ताऊ जी के पास गई तो उनसे कहा ताऊ जी सभी बीएड वाले लड़के पार्टी चाहते है आप आर्मी कोटा निकालो, ऐसा वे सभी चाहते है। बुड्डा तिकडमी था समझ गया सब फ्री में दावत उड़ाना चाहते हैं, डायरेक्ट मना करता तो क्रिकेट के भगवान को बुरा लगता तो उसने कहा। बेटा, असल में आज दूसरा दिन हैं,
मैं चौंकीं ताऊ जी को आज दूसरा दिन? पुरुषों में माहवारी तो ना होती मारामारी जरूर होती है।
लेकिन बुड्ढे ने कुटिल मुस्कान छोड़ते हुए अपनी बात संशोधित की हंकार पूजा करवाई है, जागरी और पंडित ने तीन दिन की केर कर रखी, यानि तीन दिन तक पूरी तरह से सात्विक रहना है। मेरी भाई की बीवी की घात है, मैंने ताई जी की तरफ देखा वो पहाड़ जैसे मौन साधे रहे, उनके चेहरे में पड़ी एक एक झुर्री पहाड़ों में मानो घने जंगल जैसी थी, उस जंगल में उनकी हंसी कच्ची नदी जैसे बहती थी। मुझे घात या हंकार पहाड़ों में कॉंग्रेस घास की तरह फैले हुए दिखते हैं जिसमे ये पहाड़ी मेहनतकश लोग बुरी तरह फँसे हुए ।
मैं वापस लौट आई, तिवारी सर मेरे चेहरे को देखकर समझ गए थे की बात नहीं बनी।
नित्या सर तभी कुछ खोजने लगे बियांर में एक छोटी सी पोटली उनके हाथ लगी... ना जाने कितने तारे उनकी आँखों में चमके। खुद को साक्षात् भोले का भक्त बोलते थे नित्या सर.... कहते थे मैंने शव साधना सीखी हुई है। हस्त विद्या से पूरे लोगों को बाँध रखा था। तिवारी और पंचम को बोले ये गटक लो।
तिवारी सर बोले हम गोला नहीं खाते, खंबा है तो बोलो.... उन्होंने बोला खंबे का सबसे सस्ता जुगाड़ है। तिवारी सर बोले ना भाई तू ही खा पंचम ने कहा लाओ एक मैं लूँगा। थोड़ी ही देर में मेरी आँखों के सामने दो भोले पड़े थे । रात काफी हो गई थी मैंने ताई जी को कहा मुझे मेरे कमरे तक छोड़ दो। आज तक एक बात समझ नहीं आई कि जाने क्यों सारे छल दो लोगों पे हमला नहीं बोलते एक अकेले को सताने में उनको भी इंसानों जैसी महारत हासिल है।
मैं अपने कमरे में वापस आई, द्वार बंद किया.... लाइट खोल दी, ये एक इलेक्ट्रॉनिक लालटेन थी जिसे प्लग करते ही वो अँधेरे को खा जाती थी। छल हमारे आसपास हमेशा मौजूद रहता है, हम खुद उन्हें बढ़ावा देते हैं खुद को डराने के लिए।
पर मैंने फैसला कर लिया था, की मैं कैसे करके मिली को कहूँगी की तुम मेरे ही साथ डिनर करना और यहीं रोज स्टे करना। मिली मेरे ही साथ पढ़ती थी पर वो दस कदम दूर के घर पर रहती थी। यही सोचते सोचते जाने कब आँख लगी। घडी ने चार बजे का अलार्म लगाया जो मेरे रोज पढ़ने का समय था। अचानक मुझे लगा कोई फुसफुसा रहा है, क्या कोई हवा थी या आत्मा?
नहीं नहीं मैं भी ना !
माँ कहती है कि चार बजे देवताओं का समय होता है, भूतों का नहीं। ये फुसफुसाहट तो कमाल सर के कमरे से आई थी जहाँ नित्या सर बिना कुछ सोचे समझे बोल रहे थे
यार कमाल तुमको भी होता है क्या रात का सपना
कमाल सर बोले हाँ सभी को होता है। यार लगता है आज ज्यादा भाँग खा ली थी मैंने ये सपने सब ख़राब कर देते हैं।
मैं मुस्काई हद है यार रात में भूतों का डर सुबह सपने टूटने का डर ये सोलह कमरे वाला घर हर्पणा भरी रातें तो स्वप्न दोष से भी पीड़ित हैं। पास के गाँव से बाघ के गुर्राने की आवाज आई। मैं रजाई के भीतर दुबक गई और रात भर जलती हुई लालटेन को मैंने बुझा दिया क्योंकि सुबह भगवान टहलते हैं भूत नहीं।
क्रमशः
सोनिया
Thursday, 19 April 2018
निर्वासन के बाद
मेरा बेटा अक्सर पिता को पुकारता है
मैं उसे हंसिये जैसा धारधार चाँद दिखाती हूँ
चाँद की परछाई मुझ पर पड़ती है
दर्द के नीले निशान उभर आते हैं
चाँद एक पुरुष है
जो कर्कश आवाज में बोलता है
निकलो आसमानी घर से
हंसिये की खरोच से
घायल हैं मेरी हथेलियाँ
मेरा बेटा चाँद नहीं देखता
धरती में टंके सितारे देखता है
जो मैंने काढ़े हैं
अब वो माँ पुकारता है
Wednesday, 14 March 2018
आज़ाद चिट्ठियां
आज़ाद चिट्ठियां
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उदासियों के बीच कई बच्चियों ने लिया होगा जन्म
इन बच्चियों के कहीं नहीं थे घर
इनकी माँएं पिता के बनाये घरों में रहती थीं
उनका भी कोई घर नहीं था!
ये सभी शील सुबहं थीं
जो क़ैद थीं गुड़ियाघर में
जो बाँट जोह रहीं थी उस पहली औरत का
जो जला देगी उत्तराधिकार के नियमों की गलत संहिता
कुछ बच्चियां धड़कती रातों को पैदा हुई
इन सभी के पास घर थे खुद के
ये पिता द्वारा बनाई गईं थीं
ये पिता की गर्जनाओं को गीली शिलाओं पर लिख रही थीं
अन्धकार में बैठी ये सभी भविष्य की
उत्तराधिकारिणी होंगी, पितृसत्ता की
उनमें से कुछ
माँ कहलाएंगी
कुछ सास
इनका होना ही निर्दोष कैदियों की जमात बढ़ाता रहना है।
कुछ बच्चियां जेल में पैदा हुईं ईश्वर की निगरानी में
ये बचपन से पढ़ रहीं थी बच निकलने के पाठ
अपनी माँओं से छुप के
सड़े गले नियमों को चलाने वाली संहिता
को जला देने वाली आग को जलाना सीख रहीं थीं.....
सीखा इन सभी ने मुलाकातें तय करना
तमाम कैदियों के बीच
नए किस्म के घर बनाना सीखना उनकी कलाकारी थी
जहाँ शील सुबह उगी लताओं की तरह
उन्होंने तरक्की के रास्ते बनाये
उनके लिए
जो निजात दिलाएं तमाम कैदियों को
ईश्वर की निगरानी में पैदा हुई ये सभी
बच्चियाँ आज़ाद चिट्ठियां हैं जो पढ़ी जा रहीं है
इनमें ही है कोई एक वह पहली औरत
जो जला देंगी गलत नियमों की किताब।
Soniya Pradeep Gaur
Soniya Bahukhandi
Thursday, 8 March 2018
तलाकशुदा औरतें
फसल नई औरतों की
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मैंने नहीं रखा कभी सोमवार का व्रत
रूठे शिव को मनाने के लिए....
के उनके जैसा ही कोई रूठा मिले
जिसे मनाते मनाते जीवन उपवास हो जाए
कसम से मैंने कभी नहीं बताया माँ को
मुझे पसंद है दिलकश आवाज और
खिचड़ी बालों वाले
या पहाड़ों की धूप में तचे रंग में कोई एक ख़ास
कभी नहीं बांधे मैंने उस पुराने वट में
मन्नत के धागे
नहीं जलाई तुलसी के सामने धूप-बत्ती
बचपन से सुनती रही उसकी बेचारगी की कहानी
मैंने कभी नहीं माँगा प्यार, पके आम की तरह वह मुझे अपनेआप मिला
शादी एक विकल्प की तरह थी मैंने स्वीकार किया
क्योंकि मुझे आम कुछ खास पसंद नहीं थे
विकल्प भविष्य में मेरी आत्मा में होने वाला एक घाव है
मुझे पसंद था मेरा बचपना
जिसकी पीली फ्रॉक पर सुर्ख लाल तितलियां उड़ती थी
अब तितलियां यादों के पुराने फ्रेम में क़ैदियों की तरह छटपटाती हैं
विकल्प शादी की अल्बम में खिंचे मंडप में मन्त्र की तरह गूंजता रहता है
जाने वो कौन पहली औरत थी जिसने विकल्प स्वीकारने की नींव धरी
अब पूरी बस्ती तैयार है घायल औरतों की
उस पहली रहस्यमी औरत की खोज में रखने लगी हूँ इन दिनों मैं भी शिव का व्रत!
वो पहली औरत दफन है उसी जमीं के भीतर एक सभ्यता बनकर
जिसमे फ़ैल चुकी है उपवास करती कराहती हुई स्त्रियां
उत्खनन में उसका जीवाश्म नहीं मिलेगा
मिलेंगे सोने के सिक्के
जो पैदा करेंगे झपट्टा मारने वाले विकल्प
मैं कराहती औरतों के बीच लौटूंगी, अपना व्रत खंडित करने
मुझे भी बनना है अब पहली औरत.... जो अपने विकल्प को त्याग देगी
भले फ़ैल जाए सनसनी समाज के बियाबान जंगल में
मेरी माँ मुझे लुभाती रहे खिचड़ी बालों वाले की रूपकथा सुनाकर।
मेरे इस नए जन्म के बाद ही फैलेगी नई बस्तियां समाज में
सुनाई जाएँगी नई औरतों की सभ्यता की कहानी
अब मैं भी आम पसन्द करने लगी हूँ।
Soniya Bahukhandi
#औरतें
Happy international womens day
Wednesday, 7 March 2018
माँ ने गलत सिखाया है/ महिला दिवस पर विशेष
माँ ने गलत सिखाया है
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अगर मेरी कविता पढ़ते वक़्त
नज़र आये मेरा दुःख
उसे बहने देना दिल में
ये दर्द मेरी जैसी असभ्य औरतों का दुःख होगा।
जो आज तक न समझ पाई पुरुष स्त्री का भेद!
तुम सिखा सकती थी इस भेद को कुछ यूँ, जैसे
फसल अपने भीतर छुपाये रहती है अनाज
अपनी देह को तपाते हुए पैदा करती है गेँहू-धान
ऐसी ही होती है औरत जो दर्द में होकर भी पैदा करती हैं पुरुष!
पर तुम बोली धीरे बोलो भइया तो लड़का है
तुम ठहरी लड़की
समाज की जुबान फुसफुसी है लेकिन कान तेज हैं
शांत रहो
पहली दफ़ा जब पेट दर्द और शरीर में महसूस किया था चट्टानों के भार को
तुम मुझे समझा सकती थी की औरत भी ब्रह्मा है पर
तुम मुझे अचार में फैली फफूँद और पूजाघर की सरहदों के बारें में समझाती रही।
और समाज फुसफुसाता रहा
एक और अछूत के बढ़ जाने पर
मुझे तुम रात और दिन का भेद समझा सकती थी
जब उम्र मुझमें घोड़े की तरह सवार थी
तुमने लगा दीं मेरे खेलने पर पाबंदी
मुझे मुझसे लड़ने के लिए छोड़ दिया अकेला
मैं देखती रही बिखरते हुए कई लड़कियों को सड़कों पर रात में
जो मासूम सुबह तक बेशर्म अख़बार की सुर्खियां बन गई
माँ तुम्हारा समाज चोर है जो फुसफुसा के भाग जाता है
मैं सिपाही की तरह उसे खोज रही हूँ
और तुम आज तक उसकी भयानक तस्वीर दिखा के
मुझे डरा रही हो।
मैं महसूस कर रही हूँ तुममें दर्द नही पैदा हुआ
मुझ जैसी असभ्य औरत को समझने का
Soniya Bahukhandi
Saturday, 11 November 2017
निर्वासन के बाद देहकोठरी
निर्वासन के बाद देह कोठरी
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माँ बोली ठीक नही तुम्हारे लिए
बिल्कुल नागफनी है वह
स्वाद भी मीठा नही
रंग शक्कर जैसा है बस उसका
उसने सुना और
अपनी आकाश जैसी बाहें फैला दी
पहाड़ तिलचट्टों जैसे शोर मचाते रहे
रातें नदियों में डूबती गईं, चाँद शर्माता रहा
रात के विदा होते ही सिमटने लगी उसकी लंबी लंबी बाहें
बिखरे पड़े थे नागफनी के दंश,
पहाड़ों पर रेंगती लाल चीटियां
झूठे आनंद की मौत अपनी ही परछाइयों में
खामोशी से देखती रही ये हादसे मेरी माँ
जिसने कहा था ठीक नही वह तुम्हारे लिए
Soniya Bahukhandi
निर्वासन के बाद देहकोठरी
निर्वासन के बाद देह की कोठरी
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उसने चुना प्यार
भूख नही लगती अब उसे
पेट फूलों की पंखुड़ियों से छोटा होता है
धूप उस पर गुजरती है
वह फूल सी कुम्हला जाती है
कुम्हलाते फूलों का झड़ना पतझड़ के जीवन की परिभाषा है
पतझड़ का जीवित होते ही
बोलना
भूख बढ़ाना सीखो
बढ़ती भूख वसन्त का पुनर्जीवन होगी
अब उग रहे हैं उसकी नाभि में
सुर्ख फूल
शेष
Soniya Bahukhandi
Thursday, 28 September 2017
बेशर्म पत्नियां
रात की तन्हाइयों से भी डरावना था
भरोसा टूटना।
नाली के कीचड़ से ज्यादा घिनौना
अपमान की बारिश के छींटे पड़ना था
प्रेम से थोड़ा ज्यादा बेशर्म थी
नदी सी देह!
पृथ्वी से भारी उसकी दो आंखें
दो बहरूपिया संसार थे जिसमें।
घिनौने संसार को पार करके
देखने भर को ही मिल पाता था बेशर्म प्रेम का संसार!
नदी वास्तव में ज्यादा बेशर्म है
या फिर पत्नियां!
Tuesday, 5 September 2017
जूता
जूता
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लौट जाना चाहती हूँ माँ के पास
फिर से वहीं अपने पुराने मकान में
कमरे के कोने में रखा जूता बोलता है रुको!
तुम्हारा सृजन प्रेम के लिए हुआ है...
तुमको भूरी आँखों वाले बिलौटे से डरना नहीं बस कबूतर की तरह आँखें बंद कर लेना भींच कर
मत समेटना इस देह को.... बिखरे रहने देना
बस यही बिखरापन पसंद आएगा उसे,
देह बिखरे सामान से ज्यादा बेहतर नजर आती है, बिखरी हुई।
कैसा यह सृजन?
सोचती हूँ और कमरे के कोने में पड़ा जूता किसका ?
शायद मेरे प्रेमी का होगा।
मैं खुद उत्तर देती हूँ।
मैं नही लौट सकती माँ के पास
उनका सृजन भी प्रेम के लिए हुआ होगा.
और उनके कमरे में भी एक बोलने वाला जूता रखा होगा।
सोनिया
#औरतें
Monday, 4 September 2017
पलायन
गूंगे खेतों के बीच
तुम्हारा मिलना
एकांत की उम्र पार करना रहा।
बिच्छू घास का जहर
उतार लिया मैंने
जो चढ़ा था तुम्हारे होंठो से शरीर पर!
गोलियों से छलनी अकेलेपन के घायल सिपाही
तुमसे मिलने के बाद जाना
तुम बहुत बेसुरे हो
तुमको पसन्द है मिलन के गीत
जो बजते हैं मेरे कमरे में।
एक कमरा तुमको और पसन्द है
जिसकी मालकिन
खारे पानी के बीच बड़ी बड़ी आँखों वाली
लिख रही है स्त्रीवादी कहानियां!
ओह्ह तुम मेरा प्रेम नही मन मे दबी
अभिशप्त इच्छा हो
तुम कहानियां सुनो
मैं सुनूँगी तुम्हारे हिस्से के गीत
दर्द अब मेरा सहयात्री है
मेरे होठों पर ही भी धँसे है बिच्छू घास के डंक
जो चुभे थे तुम्हारा दंश निकालने में
एकांत यूँ नहीं मरेगा वह अमर है
कुछ गोलियां मुझे भी लगी हैं
नई भर्ती है सिपाही के तौर पर मेरी
पहाड़ी सीमाओं पर।
लटकी है जहाँ तख़्ती, पलायन की।
#औरतें
Soniya Bahukhandi
Friday, 1 September 2017
भूलना सबसे बुरी आदत
तुमने कहा रात समेटो
आधी समेट पाई भूल गई
खुद को समेटने लगी!
भूलने की आदत मेरी
दुनिया की सबसे बुरी बात है!
घर बिखरा है सजा देना
सबसे ज्यादा बिखरी हुई मैं थी
मैं बिस्तर सजाने लगी
एक बड़ी आपदा के बाद खिली धूप
तमाम गीले कपड़े सुखा देना तुम बोले
मै दर्द सुखाती रही।
मैं हटा देना चाहती थी
दिल मे शासन करने वाले निरंकुश को
लेकिन भूल गई।
मेरा भूलना जीवन का ज़ख्म है
मैं उस पर पपड़ी जमाना भूल गई हूं
पर तुम मुझे पूरा याद हो
इतनी भी भुलक्कड़ नही।
Soniya Bahukhandi
#औरतें
Tuesday, 24 January 2017
औरत
औरत....
चित्रकार लड़की ने कैनवास पर
ख्वाब का चित्र बनाया...
चूंकि मार्डन आर्ट थी पिता ने
शादी समझा!
उसने शादी को जब कैनवास पर
उकेरा....
एक आदमखोर शेर की तस्वीर उभर आई
जिसके मुख से टपक रहा था ताजा रक्त!
जब उसने आज़ादी का चित्र बनाया
तो लोगों ने उसे चरित्रहीन करार दिया।
अब जब भी वह चरित्रहीन खुद का चित्र बनाती है
तो लोग कहते हैं ये तो औरत है!
Soniya Bahukhandi
Thursday, 19 January 2017
लेनिन..... एक औरत का किस्सा ( मेरी माँ में मेरा होना)
दो दिन दर्द के, बाद भी जब बच्चा नहीं हुआ तो माधवी रोने लगी और डॉक्टर की तरफ देख कर बोली अब बस ऑपरेशन कर दीजिए.... नहीं आज का दिन और देखेंगे, डॉक्टर मरिया बोली। ये पहला प्रसव नही था, सात साल पहले जब भारत की राजनीति का काला अध्याय, आपात काल के रूप में आया तब भी चीखी थी वह ऐसे ही किसी सरकारी अस्पताल के कमरे में। क्लोरोफॉर्म की तेज बदबू और औजारों की चुभन के बाद एक गोरा लड़का पैदा हुआ। वह तो चाहती थी कि, इंदिरा गाँधी की नसबंदी योजना में वह भी शामिल हो जाए... और दर्द से मुक्त हो जाये...लेकिन इंदिरा की योजना के साथ ही उसका ख्याल भी सफल नहीं हुआ। जबकि इंदिरा ने कहा था- "कि आपात के विरोध में कुत्ते भी नहीं भौंके" मार्च में आपात के साथ इंदिरा की तीसरी पारी समाप्त हुई पर आपात जाते जाते लोकतंत्र का सबक छोड़ गया। पर माधवी के पति के लिए कुछ नहीं छोड़ गया। ढाई साल बाद एक लड़का और पैदा हुआ।
माधवी की सोच ढीली पड़ी। दर्द फिर शुरू हुआ..... नर्स बोली ऑपरेशन करना होगा पानी पूरा निकल चूका है। डॉक्टर आई ---- और क्लोरोफॉर्म की बदबू के बाद सब लाल इस बार एक बेटी थी... दर्द के सफर में डॉक्टर ने कहा कान पकड़ अब नहीं करेगी, और माधवी ने साहस के साथ बच्चा न हो, खुद की ही नसबंदी कर वाली। इंदिरा सरकार चौथी पारी के साथ आई पर अब वो पिछली गलतियां नहीं दोहराने वाली थी। जबकि माधवी पिछली गलती करने वाली नहीं थी। दोनों औरतें साहस से पुनः सत्ता में आई।
गर्मियों के फूल खिलने लगे.... गुलमोहर दहकने लगा। अनुमेहा का आना मात्र साजिश ही थी । हालाँकि पिता वीराभ खुश थे पर कितना कौन जाने? कांग्रेस के धुर सहयोगी.... गुड़िया को घर वालों का प्यार काम पड़ोसियों का ज्यादा मिला। अचानक देश फिर जलने लगा इंदिरा की मौत के बाद.... गुस्ताखी किसी की सजा कई लोगों को मिली। बड़ी तादात में सिक्खों की बस्तियां जली। मौतें हुई। बड़ा समय लगा सत्ता को दोबारा सही होने में। बच्चे कुछ नहीं समझते। उनमें बड़े होने की होड़ लगी रहती है खासकर लड़कियों में। माँ को होश नहीं होता काम के आगे।
एक दिन अनु को पड़ोस में छोड़ा राजू की माँ के पास, वही गुड़िया खेलने लगी।
गुड़िया खाना खायेगी- राजू की माँ बोली
गुड़िया ने सहमति से सर हिलाया, ले खा ले रोटी को गोलू बनाके राजू की माँ काम करने लगी, भीतर उनका 17 साल का राजू किसी और दिमाग में था । उसने बोला माँ तुम काम करो मैं खेलता हूँ बिट्टी के साथ। उसने दरवाजा बंद कर दिया.... 4 साल की गुड़िया उस खेल को खेल ही समझती भले दर्द भरा खेल होता अगर उस दिन मां का काम न ख़त्म हुआ होता। दुर्घटना होने से बच गई। गुड़िया के शरीर में अजीब से निशान देख कर माँ ने घर बदल दिया।
अजीब बात है, औरत जिद में तब आती है जब कुछ बिखरने को होता है या बिखर जाता है। दिन काफी चुप था उस दिन, या हड़ताल पे चला गया। पर माधवी निकल गई... कडुवाहट भरी स्मृतियों के साथ। वैसे भी उसके आँचल से प्रेम भरी तितलियाँ तो तभी उड़ गई थी जब उसे पता चला था वह सभी तितलियाँ किसी और के आंचल में चली गई। ये दो बहुत बड़ी दुर्घटनाऐं थी जो उसके जीवन में घटी, वीराभ का धोखा और उसकी अनु के साथ घटी घटना जो बड़ी भी हो सकती थी। जीतने की इच्छा या हारने का भय अब उसे नहीं था।
शेष.....
लेनिन
लेनिन--- एक औरत का किस्सा
छुट्टी ख़तम। पर ज़िन्दगी की नौकरी हमेशा चालू रहती है, मौत की तैनाती होने से पहले तक! सुख और दुःख नाम के अफ़सर समय समय पर दौरा करते रहते हैं। आज सुबह टुकड़ों टुकड़ों में आई, ख्याल आते जाते रहे धुंध की तरह। सूरज के आते ही धुंध पिघल गई। लेनिन का ख्याल नहीं आया, या मैंने आने नहीं दिया। तो लगा की मैं नदी का सुनसान किनारा हूँ। अचानक एक पुरानी कविता दराज के भीतर से फड़फडाई, मेरे लिए लिखी थी शायद, क्या वास्तव में? भगवान जाने या लेनिन।
ये जो मैं लिख रही हूँ, ये ज़िन्दगी के अनकहे ख्याल हैं जो मेरे भीतर एक जीव की तरह साँस ले रहे हैं। चूंकि मैं हूँ तो ये ख्याल हैं और मैं एक दुर्घटना का नतीजा हूँ, जिसे दो षड्यंत्रकारियों ने मिल के अंजाम दिया लेकिन जिम्मेदारी किसी ने सही से नहीं ली। ये कहानी अनुमेहा से ही शुरू होगी और क्या मालूम लेनिन ख़त्म करे इसे..... फिलहाल
मेरा जन्म, गौरांग, अनिमेष, मिली,लेनिन और मैं इस कहानी को आगे बढ़ाएंगे। ये सभी मेरे भीतर एक जीव की तरह सांस लेंगे, पलेंगे... और ख्याल बनकर कागज़ पर बिखर जायेंगे। लेनिन का सफ़ेद आध्यात्मिक ख्याल बहुत बाद में आयेगा। क्या मालूम ये लेनिन मुझ पर हावी होने की कोशिश करे। इस कहानी की कहीं कहीं सांस उखड़े स्वाभाविक है। पर उसका ही प्यार है जो संजीवनी का काम करेगा, और कहानी जी उठेगी। "मुझमे मैं" से। ये अहंकार वाला मैं नहीं ज़िन्दगी वाला मैं। और आगे के पात्र कहानी को आगे पढ़ाएंगे।
शेष....
सोनिया प्रदीप गौड़
Saturday, 14 January 2017
लेनिन...... एक औरत का किस्सा (2)
लेनिन-- (2)
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देवताओं की रात्रि समाप्त हो चुकी है, सूरज अपने नए रूप में उत्तरायण में प्रवेश कर चुका है.... देवताओं की भोर छलनी से छन छन कर फ़ैल चुकी है। सुना है अब रातें हलकी हो जाएंगी, और दिन भारी। मेरे लिए तो दोनों बराबर हैं क्योंकि अनिमेष का मुँह अब गुस्से में सूजने लगा है और मैंने आज ध्यान से देखा तो पार्वती का मुँह भी अब सूज रहा था, बेचारे शिव बेचारगी में अभी तलक मुस्करा रहे थे, और उनकी बेचारगी मुझे खुद की बेचारगी से बड़ी लग रही थी। चूंकि मैं जिस शहर में थी वह भीड़ से तो भरा था पर अकेलेपन की। एक मैं और आ गई इसका अकेलापन बढ़ाने के लिए। दो लोगो की बीच पसरी चुप्पी से आया ये अकेलापन, मुझे हवा की तरह आवारा बना देता है। भटकने लगती हूँ मैं.... लगता है कि, लेनिन के आँखें मुझसे मिले, और उसकी देह में मेरी मौत हो जाए।
ये उत्तरायण एक अफवाह है, अभी तक तो रातें यूँ ही लंबी लंबी दिख रही हैं। कल एक दोस्त ने कहा कि सात रंगों को घुमाया जाए तो सिर्फ सफेद दीखता है, लेनिन का प्रेम सफेद नहीं हो सकता उसके बिना जिंदगी बिना रंग की जरूर है। मैं कैसा जीवन जी रही हूँ? मुझे नहीं मालूम, अचानक फ़ोन बजा, ये मिली थी। जो बेरंग ज़िन्दगी से मुक्त हो चुकी थी, महिला सशक्तिकरण के राष्ट्रगान में उसने भी खूब अपनी बेज्जती की धुन सुनी। उसके पति ने उसके जीवन में शायद ही कभी कोई अच्छा सा प्रेमगीत गाया हो। ये साइकिल वाला शख्स क्यों चला रहा है ये साइकिल जब महिला हर जगह समझौते कर रही है। वह समझौते कर रही है क्योंकि वह आत्मनिर्भर नहीं... समाज उसके लिए गाली तैयार रखता है अगर वह शादी के बाद , अपनी नीरस जिंदगी में आये कुछ अच्छे प्रेमगीत गुनगुनाये! 'चरित्रहीन मिली'
मैं भी चरित्रहीन हूँ क्योंकि मैंने भी प्रेमगीत गुनगुनाने की कोशिश की है। लेकिन मिली को लेनिन नहीं पसंद,क्योंकि मुझसे उम्र में बड़ा और काफी परिपक्व है। मैं मिली को बताती भी नहीं की लेनिन अब मेरा ख्याल नहीं हकीकत बन चुका है पर चुप रह जाती हूँ। क्योंकि मिली जानती है कोई और भी है जो अनु को टूट टूट के प्यार करता है, "गौरांग" पर वह भी एक झूठ है बहुत बड़ा झूठ! अब सच है तो सिर्फ लेनिन। अचानक मेरे ख्याल को सुनकर पार्वती के मुंह में मुस्कान आई जो शायद अब शिव को अच्छी नहीं लगी क्योंकि चरित्रहीन महिला किसी भी पुरुष को नहीं पसंद। पुरुष दबंग महिलाओं से डरता है और चुहिया टाइप औरतों को चूहेदानी में बंद कर देता है जबकि उसका नाम चूहेदानी है। खैर शिव जी आपको उत्तरायण की बहुत बहुत शुभकामनाएं और चूंकि मैं असुर गण की हूँ तो मैं दक्षिणायन में ही खुश हूँ। कल लेनिन को पूछना पड़ेगा की वह मेरे सात इस राशि में खुश है या नहीं? आज शिव का मुँह टेढ़ा है और पार्वती और गणेश मुस्करा रहे हैं।
शेष......
सोनिया