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Saturday, 10 November 2012

भूख की दस्तक


 
ना जाने दस्तक किधर से आ रही है?
गरीबों की खोलियों मे भूख कसमसा रही है
 
भूख को कैसे सुनाऊँ माँ की सिखाई लोरियाँ
लोरियाँ भी सिसकियों मे बदलती जा रही है
 
भूख तो अदृश्य है,देखा नहीं जिसको कभी
पेट की गलियों मे छुप कर शोर ये मचा रही है
 
 
रात की तन्हाइयों मे जाग जाती ये सदा
इसकी सदाएं आसमां के चाँद को तड़पा रही है
 
इक तरफ खामोश चूल्हा,एक तरफ बर्तन पड़े
रात की खामोशियाँ मेरे दिल को चीरे जा रही है
 
ए ख़ुदा कानों मे मेरे ये दस्तक एक चीख है
कचरे मे पड़ी रोटियाँ भूखे को मुह चिड़ा रही है
सोनिया प्रदीप गौड़
चित्र: गूगल से साभार