Thursday, 16 May 2013

ब्याज पर ज़िंदगी



ना जाने किस अज़ाब की सज़ा पा रही हूँ
के इश्क़ की हर बाजियों को हारती जा रही हूँ

तुम्हारा फ़न मेरा दिल तोड़ने से हर बार निखरा
अपनी हस्ती को तुम्हारे आगे मिटाती जा रही हूँ


ज़िंदगी कब से गिरवी पड़ी है तुम्हारे पास
अब ब्याज पर ज़िंदगी जीती जा रही हूँ

आँखों में अश्क तुम्हारे दी हुई सौगातें हैं
इन सौगातों में खुद को डुबोती जा रही हूँ

मेरे तुम्हारे बीच रिश्ता लगभग वही है
पर पहले प्यार की तड़फ खोती जा रही हूँ
सोनिया 

2 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन क्या आईपीएल, क्या बॉस का पारा, खेल है फ़िक्स्ड सारा - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. बहुत खुबसूरत अभिव्यक्ति
    डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    latest post हे ! भारत के मातायों
    latest postअनुभूति : क्षणिकाएं

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