Wednesday, 7 March 2018

माँ ने गलत सिखाया है/ महिला दिवस पर विशेष

माँ ने गलत सिखाया है
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अगर मेरी कविता पढ़ते वक़्त
नज़र आये मेरा दुःख
उसे बहने देना दिल में
ये दर्द मेरी जैसी असभ्य औरतों का दुःख होगा।
जो आज तक न समझ पाई पुरुष स्त्री का भेद!

तुम सिखा सकती थी इस भेद को कुछ यूँ, जैसे
फसल अपने भीतर छुपाये रहती है  अनाज
अपनी देह को तपाते हुए पैदा करती है गेँहू-धान
ऐसी ही  होती है औरत जो दर्द में होकर भी पैदा करती हैं पुरुष!

पर तुम बोली धीरे बोलो भइया तो लड़का है
तुम ठहरी लड़की
समाज की जुबान फुसफुसी है लेकिन कान तेज हैं
शांत रहो

पहली दफ़ा जब पेट दर्द और शरीर में महसूस किया था चट्टानों के भार को
तुम मुझे समझा सकती थी की औरत भी ब्रह्मा है पर
तुम मुझे अचार में फैली फफूँद और पूजाघर की सरहदों के बारें में समझाती रही।

और समाज फुसफुसाता रहा
एक और अछूत के बढ़ जाने पर

मुझे तुम रात और दिन का भेद समझा सकती थी
जब उम्र मुझमें घोड़े की तरह सवार थी
तुमने लगा दीं मेरे खेलने पर पाबंदी
मुझे मुझसे लड़ने के लिए छोड़ दिया अकेला

मैं देखती रही बिखरते हुए कई लड़कियों को सड़कों पर रात में
जो मासूम सुबह तक बेशर्म अख़बार की सुर्खियां बन गई

माँ तुम्हारा समाज चोर है जो फुसफुसा के भाग जाता है
मैं सिपाही की तरह उसे खोज रही हूँ
और तुम आज तक उसकी भयानक तस्वीर दिखा के
मुझे डरा रही हो।

मैं महसूस कर रही हूँ तुममें दर्द नही पैदा हुआ
मुझ जैसी असभ्य औरत को समझने का

Soniya Bahukhandi

Saturday, 11 November 2017

निर्वासन के बाद देहकोठरी

निर्वासन के बाद देह कोठरी
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माँ बोली ठीक नही तुम्हारे लिए
बिल्कुल नागफनी है वह
स्वाद भी मीठा नही
रंग शक्कर जैसा है बस उसका

उसने सुना और
अपनी आकाश जैसी बाहें फैला दी
पहाड़ तिलचट्टों  जैसे शोर मचाते रहे
रातें नदियों में डूबती गईं, चाँद शर्माता रहा

रात के विदा होते ही सिमटने लगी उसकी लंबी लंबी बाहें
बिखरे पड़े थे नागफनी के दंश,
पहाड़ों पर रेंगती लाल चीटियां
झूठे आनंद की मौत अपनी ही परछाइयों में
खामोशी से देखती रही ये हादसे मेरी माँ
जिसने कहा था ठीक नही वह तुम्हारे लिए
Soniya Bahukhandi

निर्वासन के बाद देहकोठरी

निर्वासन के बाद देह की कोठरी
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उसने चुना प्यार
भूख नही लगती अब उसे
पेट फूलों की पंखुड़ियों से छोटा होता है

धूप उस पर गुजरती है
वह फूल सी कुम्हला जाती है
कुम्हलाते फूलों का झड़ना पतझड़ के जीवन की परिभाषा है

पतझड़ का जीवित होते ही
बोलना
भूख बढ़ाना सीखो
बढ़ती भूख वसन्त का पुनर्जीवन होगी

अब उग रहे हैं उसकी नाभि में
सुर्ख फूल

शेष
Soniya Bahukhandi

Thursday, 28 September 2017

बेशर्म पत्नियां

रात की तन्हाइयों से भी डरावना था
भरोसा टूटना।

नाली के कीचड़ से ज्यादा घिनौना
अपमान की बारिश के छींटे पड़ना था

प्रेम से  थोड़ा ज्यादा बेशर्म थी
नदी सी देह!

पृथ्वी से भारी  उसकी दो आंखें
दो बहरूपिया संसार थे जिसमें।

घिनौने संसार को पार करके
देखने भर को ही मिल पाता था बेशर्म प्रेम का संसार!

नदी वास्तव में ज्यादा बेशर्म है
या फिर पत्नियां!

Tuesday, 5 September 2017

जूता

जूता
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लौट जाना चाहती हूँ माँ के पास
फिर से वहीं अपने पुराने मकान में
कमरे के कोने में रखा जूता  बोलता है रुको!
तुम्हारा सृजन प्रेम के लिए हुआ है...

तुमको भूरी आँखों वाले बिलौटे से डरना नहीं   बस कबूतर की तरह आँखें बंद कर लेना भींच कर

मत समेटना इस देह को.... बिखरे रहने देना
बस यही बिखरापन पसंद आएगा  उसे,
देह बिखरे सामान से ज्यादा बेहतर नजर आती है, बिखरी हुई।

कैसा  यह  सृजन?
सोचती हूँ  और कमरे के कोने में पड़ा जूता किसका ?
शायद मेरे प्रेमी का होगा।
मैं खुद उत्तर देती हूँ।

मैं  नही लौट सकती माँ के पास
उनका सृजन भी प्रेम के लिए हुआ होगा.
और उनके कमरे में भी एक बोलने वाला जूता रखा होगा।
सोनिया
#औरतें

Monday, 4 September 2017

पलायन

गूंगे खेतों के बीच
तुम्हारा मिलना
एकांत की उम्र पार करना रहा।
बिच्छू घास का जहर
उतार लिया मैंने
जो चढ़ा था तुम्हारे होंठो से शरीर पर!

गोलियों से छलनी अकेलेपन के घायल सिपाही
तुमसे मिलने के बाद जाना
तुम बहुत बेसुरे हो
तुमको पसन्द है मिलन के गीत
जो बजते हैं मेरे कमरे में।
एक कमरा तुमको और पसन्द है
जिसकी मालकिन
खारे पानी के बीच बड़ी बड़ी आँखों  वाली
लिख रही है स्त्रीवादी कहानियां!

ओह्ह तुम मेरा प्रेम नही मन मे दबी
अभिशप्त इच्छा हो
तुम कहानियां सुनो
मैं सुनूँगी तुम्हारे हिस्से के गीत
दर्द अब मेरा सहयात्री है
मेरे होठों पर ही भी धँसे है बिच्छू घास के डंक
जो चुभे थे तुम्हारा दंश निकालने में
एकांत यूँ नहीं मरेगा वह अमर है

कुछ गोलियां मुझे भी लगी हैं
नई भर्ती है सिपाही के तौर पर मेरी
पहाड़ी सीमाओं पर।
लटकी है जहाँ तख़्ती, पलायन की।

#औरतें
Soniya Bahukhandi

Friday, 1 September 2017

भूलना सबसे बुरी आदत

तुमने कहा रात समेटो
आधी समेट पाई भूल गई
खुद को समेटने लगी!

भूलने की आदत मेरी
दुनिया की सबसे बुरी बात है!

घर बिखरा है सजा देना
सबसे ज्यादा बिखरी हुई मैं थी
मैं बिस्तर सजाने लगी

एक बड़ी आपदा के बाद खिली धूप
तमाम गीले कपड़े सुखा देना तुम बोले
मै दर्द सुखाती रही।

मैं हटा देना चाहती थी
दिल मे शासन करने वाले निरंकुश को
लेकिन भूल गई।

मेरा भूलना जीवन का ज़ख्म है
मैं उस पर पपड़ी जमाना भूल गई हूं
पर तुम मुझे पूरा याद हो
इतनी भी भुलक्कड़ नही।

Soniya Bahukhandi
#औरतें