Wednesday, 10 October 2012

एक गर्भवती


एक गर्भवती,
रात मे पीड़ा से कराहती,
बेचैनी से करवटें बदलती।
बगल मे सोते पति को
आवाज ना दे पाई,
मन मसोस के चुप रह गई,
...
और हल्का सा मुस्काई
कल तक की बात हई।
कल मेरा खिलौना आ जाएगा
प्रांगण मे उसकी किलकरियाँ
गूजेंगी, और मेरा अस्तित्व
पूर्ण हो जाएगा......
तभी दर्द की तेज लहर उठी
वो चिल्लाई........माँ
और हो गई बेसुध.....
होश आया तो महसूस
किया खुद को
आई0सी0यू0 के बिस्तर पर
नसों मे गुलूकोज की सुइयां,
धँसी हुई, फिर भी
आँखें नन्हें को
ढूंदती हुई।
नर्स ने इस मौन
को ताड़ा,और चुपके
से कहा--- बेटा था!!!
किन्तु मरा हुआ !!
चीख भी ना पाई खुल कर
न सुन पाई अपने खिलौने
के टूटने की आवाज.....
कल से आँगन मे
किलकारियाँ नहीं
उसकी सिसकियाँ गूँजेगी,
और उसका खामोश दर्द,
जो एकांत मे बोलेगा।
सोनिया बहुखंडी गौड़


6 comments:

  1. सोनिया जी आपकी ये रचना हृदय को अन्दर से झकझोर गई दुखद

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  2. :-(

    दुखी कर दिया....

    सस्नेह
    अनु

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  3. माँ के मन की बदली दशा ... इस दर्द ने मन को छू लिया

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  4. बहुत मर्मस्पर्शी ..... पर पति को क्यों नहीं उठा पायी ? यह कैसा मन का द्वंद्व था ?

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