Wednesday, 20 March 2013

सुनो!!! मैं मर रही हूँ. और तुम निश्चिंत हो।


मैं मर रही हूँ धीरे-धीरे......

और तुम निश्चिंत हो।

जैसे तूफान आने से पहले

सागर  निश्चिंत होता है।

आतुर आत्मा देह के भीतर

छटपटा रही है, और तुम-

अपने तरल विचारों को

मंथ रहे हो……………

जैसे सागर को मंथा गया था कभी ,

ना जाने कब तुम्हारे विचार

गाढ़े होंगे और कब उसमे से

प्रेमरूपी अमृत निकलेगा........

जो मुझे जीवन-दान देगा

सुनो!! बरस ना लगाना,

अपने विचारों को सही,

दिशा में लाने मे.....

ना जाने कब मेरी भावनाएं,

धरती के गर्त में समा जाएँ,

जैसे कई सभ्यताएं समा गई!!!!

हड़प्पा जैसी--

हाँ!!! मैं भी तो एक सभ्यता हूँ,

सामाजिक सभ्यता---!

जो तुम्हारी अनदेखी से,

धीरे-धीर लुप्त हो रही है।

बचा लो मेरे अस्तित्व को, और

संरक्षण और संवर्धन कर लो मेरा,

मेरे ख़त्म होने से पहले............

सुनो!!! मैं मर रही हूँ

और तुम निश्चिंत हो।

सोनिया

Tuesday, 19 March 2013

मैं विरह “विदग्धा” हूँ................


विरह विदग्धा” हूँ मैं !!!
तुम्हारे लिए।
संशयान्वित न होना प्रेयस
भरोसा करो मेरा हृदय से।
आज विक्षुब्ध हूँ तुम्हारे,
विवेचन से की मैं,
समस्त वचन भूल गई।
सत्य कहा था मैंने कि,
तुम मर नहीं सकते.....
क्यूंकी तुम्हारा जीवन
मेरे पास संरक्षित है,
और मेरा तुम्हारे पास!!!
हम साहूकार बन चुके हैं,
ब्याज के तौर पर,
साँसो का आदान-प्रदान चल रहा है।
काल अवश्य लुब्धक बना बैठा है,

हमारे प्रेम को जाल में फँसाने के लिए।
ये कुछ नहीं बस मजबूरीयों कि व्यथा थी,
जो भोर मे सर्द साँसे ले रही थी।
जिसने तुम्हारे तन को सिहरा दिया।
हाँ--ये सामाजिक रीतियाँ दाहस्थल बन जाती हैं।
कभी-कभी,
और तुम सोचते होगे कि मैंने,
समस्त वचन चिता मे जला दिये।
उफ़्फ़! तुम्हारी सोच की  पैंठ,
कितनी विस्तृत हो चुकी है।
यकीनन इस से मेरे दुख
का जवालामुखी फूट पड़ता है।
और उसका लावा फ़ैल जाता है,
ये लावा कुछ नहीं मेरा,
मेरा भटकता हुआ दर्द है....
जो अचानक खौल पड़ता है,
सुनो!!! जिंदा हूँ मैं अभी तक
क्यूंकी मेरे प्राण संरक्षित हैं तुम्हारे पास
और तुम्हारे मेरे पास...........
मैं विरह  विदग्धा”  हूँ................
मात्र तुम्हारे लिए।
सोनिया 

Thursday, 14 March 2013

मैं कुछ नहीं........मैं बस तुम हूँ!!!!!

मैं कुछ नहीं, मात्र,
एक पिघला हुआ धुआँ हूँ
जो तुम्हारे इर्द-गिर्द फैला है,
एक आभामंडल कि भांति,
लाख प्रयासों से भी तुम
उड़ा नहीं सकते मुझे।
... मैं कुछ नहीं एक ‘याद’ भर हूँ
जो निहत्थी और निडर होकर
आती है तुम्हारे समीप,
एक हथियार कि तरह,
और तुम पराजित हो जाते हो
बिना मुझसे युद्ध किए।
मैं कुछ नहीं चंद ‘तारीख़’ हूँ
जो लटकी पड़ी हैं तुम्हारे,
जीवन कि दीवार पर।
कुछ तारीख़ें वह हैं
जिनके संग मिलकर मैंने और तुमने
मधुर पल बिताए.....
और कुछ तारीख़ें वह हैं 

 जिनमे हम कभी नहीं मिल पाये।
मैं कुछ नहीं एक ‘अनहोनी’ हूँ
जो बस घट गई तुम्हारे जीवन में!!!!
और छोड़ गई कुछ और होने का अंदेशा!!!
क्यूंकी ‘होनी को कौन टाल पाया है भला’।
मैं कुछ नहीं एक ‘सूखा घाव’ हूँ।
मुझे स्मरण करने के बहाने,
जिसे तुम प्रायः हरा कर लेते हो।
और भिड़ जाते हो दर्द से!!!
जिसका तुमको तनिक डर नहीं!!!!!
मैं कुछ नहीं........मैं बस तुम हूँ!!!!!
मैं मौजूद हूँ तुम्हारे अंतस में
मत ढूंडो मुझे इधर-उधर,
खुद में खोजो- मेरा अस्तित्व!!
जो तुम्हारे अंतस मे पसरा पड़ा है,
तुम जिधर,जाओगे मुझे ही पाओगे।
हाँ- इस खोज-बीन में तुम
खुद को नहीं देख पाओगे!!!
क्यूंकी तुम्हारा अस्तित्व
मेरे भीतर पसरा पड़ा होगा।
सोनिया

Thursday, 28 February 2013

शहरीकरण का जादू


सन्नाटों ने शोर यूं ही न मचाया होगा
स्वर्ग से उत्तराखंड मे,
शहरीकरण ने जादू चलाया होगा

जल-पूर्ति के लिए मीलो का सफर तय करती,

ग्राम्या की कमर ने भी बल खाया होगा॰

ज़िंदगी दवा की फरमाइश कैसे करती,

डाक्टर भी आने से कतराया होगा।

पहाड़ों मे बसे गाँव उजड़ रहे,शिलाओं ने भी अश्रु बहाया होगा।

यूं ही ना पलायित हुए होंगे नौजवान साथी

कुछ मजबूरी ने तो कुछ भूख ने कहर बरपाया होगा

आज जिधर देखो, उधर मरघट सी शांति फैली

शहर के चक्रव्यूह से भला कौन बच पाया होगा

बना बैठे अपना घरौंदा कंक्रीट के जंगल मे,

हरा-भरा पहाड़ जैसे इनके लिए पराया होगा।

 

Sunday, 17 February 2013

ख़्याल मफ़लूज हुए होंगे!

हर बरस की तरह,
इस बरस भी.....
उस आतुर, व्याकुल पथ के मोड पर
मेरी राह निहारते रह गए होगे होगे तुम!
और मैं आ पाई,
न सुन पाई तुम्हारी श्वासों का मध्यम स्वर 
ख़्याल मफ़लूज हुए होंगे!
न जाने क्या-क्या सोचकर।
वो सदाबहार सेमल भी ठिठका होगा!
जब तुम्हारी इन दो बोलती आँखों से,
इंतज़ार का खौलता अश्रु टपका होगा।
यकीनन कागज़ी बौगैनविलिया
भी पीर मे डूबे होंगे।
तो ख़मोश दोपहर
भी कुछ चिंतित हुई होगी
जो तुमने परवाह करते हुए,
मेरे इंतज़ार मे गुजरी होगी।
संभवतः एक अकेली ‘बबलर’ के गीत से,
तुम्हारी वियोग से भरी…..
रीती ज़िंदगी और भारी हुई होगी।
गौधूलि तक भी ना मैं आ पाई।





मेरी मजबूरीयों ने तोड़े होंगे,
सतरंगी स्वप्न तुम्हारे।
निशा के आने तक भी ना
लाँघ पाई मैं लक्ष्मण रेखा!
पथराए नैनो मे,
सावन की बूंदे लिए लौट रहे होगे।
उस ‘वरदान रूपी’ चौराहे से....
जिस ओर मिले थे कभी हम।
आज भले मिल ना पाये हों हम।
किन्तु अगले बरस, इसी दिन
मैं तुमसे जरूर मिलने आऊँगी....
यकीनन तुम दशरथ समान
अपने मिलने का वचन निभाओगे,
और समय के बिछौने मे जो कांटे पड़े हैं,
उनको पराग मे बदल जाओगे।

Saturday, 26 January 2013

जन-गण चलो मन से एक गान गायें.


ये संविधान गरीबों और मध्यम वर्ग के लिए सजा है
गौर से देखो अमीरों की बस्ती मे ये एक मजा है।

एक औरत की आबरू कैसे बचे?,इसका कोई अनुच्छेद नहीं!!!
दोषियों को बचा लेने पर न्यायधीश को कोई खेद नहीं....

प्रस्तावना तो बस नाम की कुंजी है....
जिधर हक की लड़ाई मे उम्मीदें हमारी भूँजी हैं

ये गणतन्त्र दिवस मनाने की सज़ा बहुत बड़ी है....
लालची नेताओं की जीभ श्वान से बड़ी है.....

जन-गण चलो मन से एक गान गायें......
ये संविधान सही नहीं,चलो एक नया संविधान बनायें।
सोनिया
 

Friday, 18 January 2013

मैं गंगा बनकर आती हूँ

क्या उत्तर दूँ जग को मैं
कौन हृदय मे बसता है
आतुर,विकल नयन मे,
एक स्वप्न तुम्हारा सजता है।

तुम दुर्लभ से लगते हो क्यूँ?
...जैसे मुझे मिल ना पाओगे,
शूलों से भर हुआ जीवन
पुष्पों से सजा ना पाओगे 





मैं गंगा बनकर आती हूँ
के प्यास बुझा लो तुम अपनी
तुम सागर तट पर जाते हो
क्यूँ प्यास बुझाने को अपनी ?!!!!

मैंने अपने गीत समर्पित
कर डाले जाने क्यूँ तुमको ?
प्रीत की रीत निभा ना पाये
क्या गीत ना भाए मेरे तुमको?

जेठ की घाम भी क्या सोखेगी
मेरे बहते नीर को,
जब तुम दिल से ही ना समझे
मेरे हृदय की पीर को,

क्या उत्तर दूँ जग को मैं
कौन हृदय मे बसता है.
सोनिया