कुछ नहीं लिख पा रही
विचारों से मात खा रही
लिखने की मेरी कला
विलुप्त होती जा रही
लग रहा हड़ताल पर
शब्द आज हैं खड़े !
जाने मेरे विचार पर,
आज पत्थर क्यों पड़े?
अपनी कलम को आज मैं
बेमकसद घिसे क्यों जा रही ?
कुछ नहीं लिख पा रही
विचारों से मात खा रही
हूँ सिपाही कलम की
फिर भी ना जाने आज क्यों
मैं जंग से घबरा रही
विचारों मे जमी काई को
मैं हटा नहीं पा रही
कुछ नहीं लिख पा रही
विचारों से मात खा रही






