Thursday, 28 June 2012

विचारों से मात



कुछ नहीं लिख पा रही

विचारों से मात खा रही

लिखने की मेरी कला

विलुप्त होती जा रही

लग रहा हड़ताल पर

शब्द आज हैं खड़े !

जाने मेरे विचार पर,

आज पत्थर क्यों पड़े?

अपनी कलम को आज मैं

बेमकसद घिसे क्यों जा रही ?

कुछ नहीं लिख पा रही

विचारों से मात खा रही

हूँ सिपाही कलम की

फिर भी ना जाने आज क्यों

मैं जंग से घबरा रही

विचारों मे जमी काई को

मैं हटा नहीं पा रही

कुछ नहीं लिख पा रही

विचारों से मात खा रही

Monday, 25 June 2012

तेरे केश देखूं

तेरे केश देखूं तो गंगा....लगें हैं
बहती है जिसमे मेरी प्रीत निर्झर...
मुझे तुम विसर्जित करो इन लटों में...
मुझे जीवन अमृत इन्ही में मिलेगा..
मेरी प्रियतमा तुम मुझे ना भुलाना..
तेरे प्रेम से मेरा जीवन सजेगा.. (सोनिया बहुखंडी गौड़ )

Friday, 8 June 2012

जिनका मैंने किया सृजन


आज-कल पहाड़ मे अपने गाँव आई हुई हूँ, जहां एक ओर हरी-हरी वसुंधरा और घने-घने तरुवर की छाव है, वही कुछ कष्टों का अनुभव भी किया है, कल हमारे घर एक व्रध महिला आई... बच्चों से सम्पन्न लेकिन अपनी माँ-पिता जी को अपने साथ ले जाने के लिए बच्चे तनिक तैयार नहीं है... उनके दिल का मर्म मेरी कविता मे उतर आया है-विषय प्रासंगिक कृपया सभी नव-पीड़ी ध्यान दें। और इस मर्म को और गहरा ना बनाए, क्योंकि अतीत भविष्य के रूप मे पुनः लौट कर आता है, जलती लकड़ी कितना भी जल जाये आगे की ओर ही आती है नाकी पीछे की ओर----
                                   जिनका मैंने किया सृजन




मैं चिंतन से लथपथ

वेदनाओं से ओतप्रोत

जिनका मैंने किया सृजन

वे जाने कहाँ हुए लोप?॥

चेहरे के वलय

अब हुए घने

दुर्दिन मे, मेरे अपने,

एकांत मे गए मुझे छोड़॥

वस्त्र मेरे चिथड़े-जर्जर(नश्वर शरीर हेतु)

पैबंद की अब आस नहीं

नए वस्त्र की चाह मे

ईक्षा से जाऊँ,देह त्याग॥

चिंतन इस बात का है मुझको

जिस पीड़ा से मैं भरी हुई

एकांत की उस छाया का

अपनों  तक ना फैले प्रकोप॥

कष्टो से लदा मेरा वर्तमान,

कल को अतीत हो जाये जब

मेरे दिल के टुकड़ों पर,

बरपाए ना वो तनिक क्रोध॥

मैं चिंतन से लथपथ

वेदनाओं से ओतप्रोत

जिनका मैंने किया सृजन

वे जाने कहाँ हुए लोप?॥ सोनिया बहुखंडी गौड़

Wednesday, 30 May 2012

वो! आबरू को लूट मेरी,आज धनी बन गए

सोचते हैं वो!
आबरू को लूट मेरी
आज धनी बन गए
और मुझको इस
धरा मे कवचहीन
कर गए---
... आज जब घर जाएंगे
दर्पण भी लज्जित हो जाएगा
लाख ढँप लें तन को अपने
धिक्कार से भर जाएगा
आज मेरे नैन जो,
अश्रुयों से भर गए,
घर मे खड़ी माँ-बहन से
ना नैन मिला पाएगा
जो प्रीत उस पापी ने
मेरी नश्वर देह
से लगाई थी
धिक ऐसी प्रीत को
जिसने एक अबला की लाज
भरे जग लुटाई थी
हस ले पुरुष तू आज जितना
पुरुषत्व के इस् दर्प पर
अपनी नजर मे जब
तू गिरेगा-
पुरुषत्व का
ये दर्प, काँच सा चूर-चूर
हो जाएगा,
सोनिया बहुखंडी गौड़

Monday, 28 May 2012

तुमने मेरा परिहास किया।






प्रेम है तुमसे

मैंने कब अस्वीकार किया!!

मैंने बस अपनी

मजबूरी से परिणय

करना,स्वीकार किया

जब भी तुम

परिक्लांत हुए!,

मेरे आँचल की

छाँव मिली,

फल इसका क्या

मुझे मिला?

तुमने! प्रेम मेरा त्याग दिया,

समझ ना पाये

क्या अब तक,

मेरी मौन मे था सब कुछ,

किन्तु छलावा था

वो सब! जिसको

तुमने ज्ञात किया

प्रेम इसे ही

कहते हैं क्या,

जब भावों का

मर्म न समझ

सके, दिल टूटा

मेरा उस क्षण

जब मुझे संघतिक

कह वार किया

जब मैंने समझाना

चाहा,तुमने मेरा परिहास किया

प्रेम है तुमसे

मैंने कब अस्वीकार किया!!

मैंने बस अपनी

मजबूरी से परिणय

करना स्वीकार किया


Friday, 25 May 2012

खुशबू अचानक फिर, तुम्हारी आई है।

जागरण करती रही,
मैं रात-भर
याद ने तेरी मुझे
सोने ना दिया,
या कहूँ कम्बखत!
स्व्प्नो के भय से
... नींद मे खुद को
नहीं खोने दिया
स्वप्न टूटे पीर
होती है बहुत,
तुमसे मिली एकांतता
टीस देती हैं बहुत,
इनसे भली यादें
तुम्हारी हैं प्रेयस
जो चल रही हैं
संग मेरे हर घड़ी
लाती हिमालय से
कभी ये सर्द रातें
और कभी मरुभूमि की,
गरम सांसें,
आज मलयज को
बहाकर लाई है ये!!
खुशबू अचानक फिर
तुम्हारी आई है
खुशबू अचानक फिर, तुम्हारी आई है।
सोनिया बहुखंडी गौड़ (25/05/2012)

Thursday, 24 May 2012

तुम्हारी मौत

दीवारों का रंग स्याह क्यों हुआ?
कल तक तो सुखों के रंग दमकते थे,
दुख चील की तरह पंख फैलाए है।
उन पंखों की छाया से दीवार स्याह हुई,
कल तक मेरे सपने सूखे थे,
जो सुख से लबरेज थे, और तुम्हारे,
अहसासों से भरे थे॥
आज सपने गीले-गीले हैं,
दुख की पैंठ सपनों तक पहुँच
चुकी है,
बे-मौसम की बारिश
मेरे आसुओं को धोने मे प्रयासरत है।
मैं गंगा के तट मे,
तुम्हारी अस्थियों का विसर्जन
देख रही हूँ, यकायक पानी मे
तैरती अस्थियों मे मुझे मेरा ही
चेहरा नजर आता है,और तट मे बैठे तुम
लगता है की तुम नहीं मरे, किसी ने
तुम्हारी मौत की झूठी खबर मुझ तक फैलाई
ये विसर्जन भी झूठा है। तुम तो आज भी
जीवित हो। मुझमे सांस लेते हुए,
हो सके तो स्याह पुती दीवारों पर
प्रेम का रंग चढ़ा देना,
और गीले सपनों मे सुख का
सूखापन मिला देना........