Saturday, 12 May 2012

ईश्वर आज फिर से जी उठा है.

स्वांत सुखाए हेतु
ईश को मैंने त्याग दिया था
या फिर ऐसा बोलूं
... प्रतिमायों को कफ़न से
ढांप दिया था।
तम के प्रति जागरूक होकर
सूरज को था ठुकराया मैंने,
कुछ दिन तक पहले
प्रेम किसी का न पाया मैंने
किन्तु इन दिनों
एक अपरिचित
प्रेम का दीप,
लिए खड़ा है,जिससे
अंधियारा मन मेरा
दीप्त हुआ है
श्वेत रंग भी हुआ गुलाबी
सुख के सदन में
ईश्वर आज खड़ा है,
जब से तुमको पाया प्रियतम
मेरी दृष्टि में
कफ़न में लिपटा ईश्वर
आज फिर से जी उठा है.
(सोनिया बहुखंडी गौर )

Thursday, 10 May 2012

हिंदुस्तान का भविष्य


मैं गरीब हूँ..गलीच नहीं,
क्या हुआ के!!
मैं अमीरों के बीच नहीं, मेहनतकश हूँ,
कमाता हूँ,अपनी जिन्दगी जीता जाता हूँ,
दो मृत शरीरों ने मुझको पैदा किया,
किताबों की जगह, ये कचरे का झोला दिया
मिटटी से सना था जब पैदा हुआ,
मिटटी के बीच आज भी खड़ा,
शर्म करो भ्रष्टाचारी नेताओं...
मेरे हिस्से के अर्थ से तुमने उदर भरा,
चिंता मेरे लिए धुएं के जैसी है
जिसे मैं उडाता जाता हूँ,
मेरे कंधे में कचरे का झोला नहीं
हिंदुस्तान का  भविष्य है
जिसे मैं ढ़ोता जाता हूँ---ढ़ोता जाता हूँ

Tuesday, 8 May 2012

घर के बागीचे पर एक मनीप्लांट की बेल पर एक बड़े पत्ते के सहारे, उसी पत्ते के उप्पर एक नए अद्खिले पत्ते के भीतर चिड़िया रानी ने अपना घोंसला बनाया है, घोंसला टूट ना जाए इस लिए बड़े ही चुपके से ये फोटो क्लीक कर दी... उस्सी विषय पर ये रचना बन पड़ी है.....




चाय की चुस्कियां लेते समय
अचानक एक नन्ही बादमी
चिड़िया पर नजर पड़ी
जो बागीचे में लगे
मनीप्लांट की तरफ
जाती और लुप्त हो जाती!!
ना जाने फिर कहाँ से
वापस आ जाती,
एक लम्बी उडान भरती
तिनके और दानो की खोज में,
थकी और कम्पित साँसे लिए
ये क्रिया अनवरत चल रही है
छाँव के लिए उसे किसी
घने तरुवर की चाह नहीं
उसे तो बस चलते जाना है,
मन विस्मित है मेरा
मनीप्लांट में ये तिनके
ठहर पायेंगे?
जिज्ञासु मन मेरा चल पड़ा
नन्हे शिल्पी को परखने,
किन्तु यह क्या?
मनीप्लांट के बड़े,
अधखिले कोंपल को,
भीतर तिनके के बिछौने से सजाया है,
किसी को भी डाह हो जाए,
अपने नर्म गद्दों पर,
तिनके के बिस्तर पर,
तीन नवजात चूजे ची-ची
कर रहे थे, जैसे मानव शिशु
किलकारियां भरता है,
तभी चिड़िया ने तेज-तेज
ची-ची करना शुरू किया
मानो कह रही हो--
दूर हटो,मेरे घोंसले से
तुम मेरी शक्ति से परिचित नहीं
मुझमे सृजन और संहार की
क्षमता है
मैं माँ हूँ !!
ये सुन मेरा ह्रदय
मातृत्व से भर उठा
लगा चिड़िया कहाँ बोली
ये तो मैं बोली हूँ,
चिड़िया तो माध्यम है
हां उस चिड़िया में
इन दिनों मैं क्रियाशील हूँ

Sunday, 6 May 2012

प्रिये आज दिखाऊँ

 प्रिये आज दिखाऊँ,
 चलो तुम्हे मैं...
 प्रकृति के अंदाज निराले..
 नदी,पुलिन और शीतल धारा
 और गगन का चाँद-सितारा
 आओ पाश में बांध जाएँ हम
 प्रीत बना लें एक सहारा,
 दूर से देखो उन पर्वत को,
 अपनी प्रीत के हैं ये प्रहरी
 निशा सुहानी हमें निहारे.
 चाँद ले श्वासे गहरी-गहरी,
 तरुवर  भी साक्ष्य बने है देखो
 नैनाभिराम द्रश्यों के 
 मिलन की  बेला बीत न जा जाये.
 आओ जीवन सुखांत बनाये
 अब काहे की देरी------------------

Friday, 4 May 2012

( अजन्मी भ्रूण की कहानी )

आज गीला है बहुत,
मेरी माँ का आंगन
मृत्यु   पर मेरी  रोई बहुत!!!
क्षण-क्षण हुई आहत मेरी माँ...
जाने अबल क्यों हो गई?
दुर्जन जगत के सामने,
क्यों आश्वहीन वो हो गई?
मैं; चार माह की थी.. अजन्मी
कोख को समझी जगत,
अनजान थी, ,मैं मूर्ख थी,
मुझ को कहाँ इतनी समझ...
वंचक बना मेरा पिता,
औरस की थी उसे लालसा
जीवन की मेरी नाव का
पतवार कोई ना बना.......
मेरी माँ बिलखती ही रही,
दानव पिता के सामने....
औजार,चाक़ू,पिनों से.....मेरी जब हत्या हुई
यम भी लगे थे कांपने,
मेरी माँ की कोख उजड़ गई
खिलने से पहले एक कलि
बिन खाद ,जल के मर गई
इतने बड़े संसार में मेरी माँ अकेली पड़ गई----२
देख माँ के इस एकांत को
मेरी आत्मा बिफर उठी..
और चीख कर मैंने कहा----
ओ पुरुष! तू पुरुषार्थ के
क्यों दंभ से भीगा हुआ?
क्या तू नहीं है जानता?
मेरे जनम से जो जग बना
मेरे अंत से मिट जायेगा...
कन्या-भ्रूण हत्या पाप से
तू कभी ना बच पायेगा, तू कभी ना बच पायेगा

सोनिया बहुखंडी गौर

Thursday, 3 May 2012

( अपने पिता की याद में लिखी गई एक कविता.....जो अब नहीं रहे )


 पापा याद है मुझको तुम्हारी वो बीमार आंखें
तुम्हारी टूटती साँसे, जिन्दगी थक गई जैसे,
म्रत्युं परिचय बढाने को....तुम्हारा हाँथ थामे थी...
मौनता आपकी मुझसे बहुत कुछ बात करती थी;
बढाती बात को आगे, सूर्य निद्रा में जा पहुंचा,
सांझ की थाह पाकर के, विदा क्षण भी आ पहुंचा;
तुम्हारी विदा यात्रा में ना जाने कितने कंधे थे
नहीं था बस तेरा कन्धा.. ज...ो माँ का इक सहारा था.......
पापा याद है मुझको तुम्हारी वो बीमार आंखें.....

जिन्दगी के चौराहे में मची थी लूट कुछ ऐसी...
मैं कर्जों की गठरिया ले..व्यापारी बन गई फिर भी,
दुकां पर, एक मैं पहुंची; सजी थी जो सुहागों से
मैं माँ के लिए सब लेती..सिसक सिन्दूर था बोला
है अब बेकार सब कोशिश कहाँ मेरा मिलन होगा...
पापा याद है मुझको तुम्हारी वो बीमार आंखें.................सोनिया बहुखंडी गौर

Wednesday, 2 May 2012

विरह गीत में मैंने मुहावरों का प्रयोग किया..

"ठंडी साँसें भरकर " प्रियतम
तेरा स्मरण कर लेती हूँ.
पथ में पड़ा हुआ पत्थर हूँ
ठोकर खाकर, भी खुश रह लेती हूँ
...
जी खट्टा हो जाता अक्सर
जब भी तुम मुझको बिसराते
मेरा जी फिर भर आता है
यादों में जब तुम छा जाते।

किया किनारा जब से तुमने
आसमान भी फटा मुझी पर
आते-जाते सभी पथिक में
तेरी छवि को ही मैं खोजूं
"ठंडी साँसें भरकर " प्रियतम
तेरा स्मरण कर लेती हूँ---------------------
(सोनिया बहुखंडी गौर