Wednesday, 4 May 2016

फाँसीघर

फाँसीघर के अँधेरे कमरे में, जहाँ सन्नाटा सुस्ताता है।
भय कुछ बुदबुदाता है, फंदे के बीचोबीच खड़े होकर!
चीखती हैं ना जाने कितनी अतृप्त आत्माएं,
मैली चीकट दीवारें मुझे घूरती हैं,
मौत चील के से पंख फैलाये उड़ती नजर आती है।

मेरे भीतर की शैतान लड़की, ऐसे में मौत को बाहर सड़क पर कान पकड़ के खड़ा कर देती है।
और फाँसीघर के भीतर से, लिखती है जिंदगी से लबरेज प्रेमभरी कविता!
जिसे पढ़कर तुम मुस्कराते हो।...... डर , अँधेरा, सन्नाटा,और प्रेतमुक्ति से पीड़ित आत्माएं------- तुम्हारी मुस्कराहट से मुक्त हो जाते हैं।

सोनिया

2 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 05-95-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2333 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  2. वाह सोनि‍या...बहुत बढ़ि‍या लि‍खा

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