Friday, 27 September 2013

खामोश आँखों की बातें।

नहीं रहते पहले जैसे ख़्वाब
मुरझा जाते हैं प्रेम पुहुप
किसी साँवली सी शाम को
प्यासी निशा में गुम हो
जाती हैं, वो खामोश आँखों की बातें।
अलगाव के सहमे से स्पर्श।

अब नहीं निकलते अधरों से
थरथराते प्रेम के शब्द
बस उतेजना कागज के
पुर्जों में थरथराती है.....
कहाँ नजर आती है
देह को रोमांचित करने वाली समीर,
बस वियोग की उमस में
लथपथ रहती हूँ।

चाँदनी दिखती जरूर है,
पर सुखांत की बेवा नजर आती है।
सहसा तुमको याद करना,
अभिशाप हो जाता है.....
स्वप्न कायर की भांति
भागते नजर आते हैं.....
और मैं जलने लगती हूँ
शब्दों की मशाल से ......

क्यूँ कब और कैसे हुआ
अलगाव हमारा?
आज भी प्रश्न की खोज में हूँ,
और समय निरुत्तर खड़ा है,
मेरे समक्ष................
सुनो आ जाना उसी मोड पर
जहां एक मुलाक़ात अधूरी पड़ी है।
और हो सके तो समय के रिक्त स्थानो
को भी भर देना.........
सोनिया

Tuesday, 24 September 2013

तुमको याद रखने का दुःख



एक दर्द है,जो सहमा और सिमटा है
कलेजे के भीतर
कभी घुटता रहता है
कभी हांफने लगता है
कभी भीतर ही भीतर
विरोध के गहरे हरे रंग में पुत जाता है।
जानते हो क्यों,
सहमा रहता ये दर्द है ?
तुम्हे याद रखने के दुःख से!!!!!
एक मौत के जैसा दुख है
इस जन्म में।
हमारी अधूरी चाहत।
तुमसे न मिल पाने की
गूंगी-बहरी टीस
जो बरबस सालती रहती है।
अब ये दर्द कभी गुलाबी नही होगा
ये घुटता रहेगा कलेजे में
और विरोध के हरेपन में बेसुध हो जायेगा।
और ज़िंदगी छटपटाती रहेगी
बेबसी की दरारों के बीच।
सोनिया गौड़