Wednesday, 21 January 2015

अंतिम पलों में

अंतिम पलों में
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साँझ के पिघलते ही
काले मोम के बुत सी
खड़ी होती ये रात।
और तारों की तरह टिमटिमाती मेरी आँख।
और मेरी देह को
सहलाती ये नर्म हवा,
और पुराने पुर्ज़ों की  तरह
फड़फाड़ती तुम्हारी याद!
ये सब अचानक नहीं
सतत होता है।
तन्हाई के रास्ते
लंबे होते चले जाते हैं
रिश्ते खत्म नहीं होते
उनकी हत्या कर दी जाती है,
या वो छूट जाते हैं
जैसे ट्रेन छूट जाती हैं प्लेटफॉर्म से!
तुमसे मिलना ही दुर्भाग्य!
तुम्हारी छोटी-छोटी आँखों से प्रेम,
अपयश का सफ़र,
ख्वाबों के पंखों से उड़ान भरना और
पंखों का अलगाव के तूफां से
यकायक टूट जाना।
सब हादसों की रणनीतियां थी,
जिनको पारंगत किया था "शकुनि "ने
देखो! रात गल रही है
भोर खिल रही है-
लेकिन डूब चुकी अब
अपयश भरी बातें
प्रेम के ख्वाब
आतुर क्लांत यादें,
क्योंकि अब बुझ रही हैं मेरी आँखें।
Soniya Gaur

2 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 22-01-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1866 में दिया गया है
    धन्यवाद

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