Tuesday, 21 August 2012

ये दिल लाये कहाँ से हो

ये दिल लाये कहाँ से हो,
प्यार जिसमे पनपता है
ठौर मुझको भी बतलाना।
इश्क़ का तौर सिखलाना।
जहां इक  बसाएँगे।
सितारों से सजाएँगे...
चाँद तुम तोड़ कर लाना,
बहारें जब कभी आयें...
मेरे आँगन मे भी आयें
उनको आँगन मे बिठलाकर
रागिनी प्रीत की गाना...
अरुण की तेज किरने गर
मेरे तन को जलाएगी
पवन की सर्द साँसो को,
मेरे सदके मे कर जाना,
निशा की गुफ़्तुगु मेरी
आँखों से होगी जब
मेरे खवाबों मे आकर तुम
कलेजे से लगा जाना।
अधूरी हूँ तुम्हारे बिन
अधूरेपन को तुम प्रियतम
पूर्ण एक रूप दे जाना
पूर्ण एक रूप दे जाना
सोनिया बहुखंडी गौड़

5 comments:

  1. मन के भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने.....

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  2. भावो की सुन्दर प्रस्तुति..

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  3. सुन्दर अभिवयक्ति सोनिया जी.

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  4. सुन्दर अभिवयक्ति सोनिया जी.

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